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Sunday, June 23, 2019

10 chapter of Bhagvat Geeta दसवां अध्याय श्रीमद भगवत गीता

भगवान् शिव कहते हैं- सुंदरी! अब तुम दशम अध्याय की महात्मय की परम पावन कथा सुनो, जो स्वर्ग रूपी दुर्ग में जाने के लिए सुंदर सोपान और प्रभाव की चरम सीमा है| काशीपुरी में धीर बुद्धि नाम से विख्यात एक ब्राह्मण था, जो मुझमें प्रिय नंदी के समान भक्ति रखता था| वह पावन कीर्ति के अर्जन में तत्पर रहने वाला, शांत चित्त और हिंसा, कठोरता एवं दुस्साहस से दूर रहने वाला था| जितेंद्रीय होने के कारण वह निर्मिती मार्ग में ही स्थित रहता था| उसने भेज रूपी समुद्र का पार पा लिया था| वह संपूर्ण शास्त्रों के तात्पर्य का ज्ञाता था| उसका चित्र सदा मेरे ध्यान में संलग्न रहता था| वह मन को अंतरात्मा में लगाकर सदा आत्म तत्व का साक्षात्कार किया करता था, अतः जब मैं चलने लगता, तब मैं प्रेम बस उसके पीछे दौड़ दौड़ कर उसे हाथ का सहारा देता रहता था|
यह देखकर मेरे पार्षद  ने पूछा- भगवन! इस प्रकार का भला, किसने आपका दर्शन किया होगा| इस महात्मा ने कौन सा तक होम अथवा जब किया है कि स्वयं आप ही पद पद पर इसे हाथ का सहारा देते चलते हैं?
 
   भृंगिरिटी पार्षद  का यह प्रश्न सुनकर मैंने इस प्रकार उत्तर देना आरंभ किया| एक समय की बात है, कैलाश पर्वत के पश्चिम भाग में पुन्नाग वन के भीतर चंद्रमा की अमृत मई किरणों से धुली हुई भूमि में एक बेदी का आश्रय लेकर मैं बैठा हुआ था| मेरे बैठने के क्षण भर बाद ही सही सा बड़े जोर की आंधी उठी, वहां के वृक्षों की शाखाएं नीचे ऊपर होकर आपस में टकराने लगी, कितनी ही टहनियां टूट टूट कर बिखर गई| पर्वत की अविचल छाया भी हिलने लगी| इसके बाद वहां महान भयंकर शब्द हुआ, जिससे पर्वत की कंदराएं प्रति ध्वनित हो उठीं | तदनंतर आकाश से कोई विशाल पक्षी उतरा, जिसकी कांति काले मेघ के समान थी| वह काजल की राशि, अंधकार के समूह अथवा पंख कटे हुए काले पर्वत सा जान पड़ता था| पैरों से पृथ्वी का सहारा लेकर उस पक्षी ने मुझे प्रणाम किया और एक सुंदर नवीन कमल मेरे चरणों में रखकर स्पष्ट वाणी में स्तुति करनी आरंभ की|
पक्षी बोला- देव आपकी जय हो| आप चिदानंद मई सुधा के सागर तथा जगत के पालक हैं| सदा सद्भावना से युक्त एवं अनासक्ति की लहरों से उल्लासित है| आपकी वैभव का कहीं अंत नहीं है| आपकी जय हो|
अद्वैत भावना से परिपूर्ण बुद्धि के द्वारा आप त्रिविध वालों से रहित है| आप जितेंद्रीय भक्तों के अधीन रहते हैं तथा ध्यान में आपके स्वरूप का साक्षात्कार होता है| आप अविद्या में उपाधि से रहित, नित्य मुक्त, निराकार, निरामय, असीम,  अहंकार शून्य , आवरण रहित और निर्गुण है| आपके चरण कमल शरणागत भक्तों की रक्षा करने में प्रवीण है| अपनी बहन कलाकृति महा सर्प की विश्व वाला से आप ने कामदेव को भस्म किया है| आपकी जय हो| आप प्रत्यक्ष आदि  प्रमाणों से दूर होते हुए भी प्रमाण स्वरूप हैं| आपको बार-बार नमस्कार है| चैतन्य के स्वामी तथा त्रिभुवन रूप धारी आपको प्रणाम है| मैं श्रेष्ठ योगियों द्वारा तुम बिन आपके उन चरण कमलों की वंदना करता हूं, जो अपार भग्गू पाप के समुद्र से पार उतारने में अद्भुत शक्तिशाली हैं| महादेव! साक्षात बृहस्पति भी आपकी स्तुति करने की धृष्टता नहीं कर सकते| सहस्त्र मुखो वाले नागराज शेष में भी इतनी जरूरी नहीं है कि मैं आपके गुणों का वर्णन कर सकें | फिर मेरे जैसे छोटी बुद्धि वाले पक्षी की तो बिसात ही क्या है?
  उस पक्षी के द्वारा किए हुए इस स्तोत्र को सुनकर मैंने उससे पूछा- विहंगम! तुम कौन हो और कहां से आए हो? तुम्हारी आकृति तो हंस जैसी है, मगर रंग कोेए का मिला है| तुम जिस प्रयोजन को लेकर यहां आए हो,  उसे बताओ?
पक्षी बोला- देवेश !मुझे ब्रह्मा जी का हंस जानिए| धूर्जटे ! जिस कर्मों से मेरे शरीर में इस समय कालीमा आ गई है, उसे सुनिए| प्रभु! यद्यपि आप सर्वज्ञ हैं[ अतः आपसे कोई बात छिपी नहीं है] तथापि यदि आप पूछते हैं तो बतलाता हूं| सूरत नगर के पास एक सुंदर सरोवर है, जिसमें कमल लह लह आते रहते हैं| उसी में से बाल चंद्रमा के टुकड़े जैसे श्वेत मृणालो के ग्रास लेकर में बड़ी तीव्र गति से आकाश में उड़ रहा था| उड़ते उड़ते सहसा वहां से पृथ्वी पर गिर पड़ा| जब होश में आया और अपनी गिरने का कोई कारण ना देख सका तो मन ही मन सोचने लगा-' अ हो! यह मुझ पर क्या आ पड़ा? आज मेरा पतन कैसे हो गया? ' पके हुए कपूर के समान मेरे श्वेत शरीर में यह कालीमा कैसे आ गई? विस्मित होकर इस प्रकार में भी विचार ही कर रहा था कि उसको खरे की कमरों में से एक ऐसी वाणी सुनाई दी---" हंस उठो! मैं तुम्हारी गिरने और काली होने का कारण बताती हूं"| तब मैं उठकर सरोवर के बीच में गया और वहां पांच कमरों से युक्त एक सुंदर कमलीनी को देखा| उसको प्रणाम करके मैंने प्रदक्षिणा की अपने पतन का सारा कारण पूछा|
कमलिनी बोली - कलहंस! तुम आकाश मार्ग से मुझे लांघ  कर गए हो, उसी पाठक के परिणाम स्वरूप तुम्हें पृथ्वी पर गिर ना पड़े तथा उसी के कारण तुम्हारे शरीर में कालीमा दिखाई देती है| तुम्हें गिरा देख मेरे हृदय में दया भर आई और जब मैं इस मध्यम कमल के द्वारा बोलने लगी हूं,  उस समय मेरे मुख से निकली हुई सुगंध को सुनकर 60000 भंवरे स्वर्ग लोक को प्राप्त हो गए हैं| पक्षीराज !जिस कारण मुझ में इतना वैभव प्रभाव आया है, उसका कारण बताती हूं, सुनो| इस जन्म से पहले तीसरे जन्म में मैं इस पृथ्वी पर एक ब्राह्मण की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई थी| उस समय मेरा नाम सरोज बदना था| मैं गुरुजनों की सेवा करती हुई सदा एकमात्र पति व्रत के पालन में तत्पर रहती थी 1 दिन की बात है मैं एक मै ना को पढ़ा रही थी| इससे पति सेवा में कुछ विलंब हो गया| इससे पतिदेव का कुपित हो गए और उन्होंने श्राप दिया-' पापिनी !तू मैना हो जा मरने के बाद यद्यपि मैं मैना ही हुई, तथापि पतिव्रत के प्रसाद से मुनियों के ही घर में मुझे आश्रय मिला| किसी मुनि कन्या ने मेरा पालन-पोषण किया मैं जिसके घर में थी वह ब्राह्मण प्रतिदिन प्रातः काल विभूति योग नाम से प्रसिद्ध गीता के 10वें  अध्याय का पाठ करते थे, और मैं  पाप हारी उस अध्याय को सुना करती थी| विहंगम !का ल  आ जाने पर मैं मैना का शरीर छोड़कर दशम अध्याय के महात्मय  से स्वर्ग लोक में अप्सरा हुई | मेरा नाम पद्मावती हुआ और मैं पदमा की प्यारी सखी हो गई| एक दिन मैं विमान से आकाश में विचार कर रही थी| उस समय सुंदर कमलों से सुशोभित इस रमणीय सरोवर पर मेरी दृष्टि पड़ी और इसमें उतरकर जैसे ही मैंने जल क्रीड़ा आरंभ की, वैसे ही दुर्वासा मुनि आ धमके | उन्होंने वस्त्र हीन अवस्था में मुझे देख लिया| उनके वैसे मैंने स्वयं ही एक कमलि नी का रूप धारण कर लिया| मेरे दोनों पैर दो कमल हुए| दोनों हाथ भी दो कमल हो गए| और शेष अंगों के साथ मेरा मुख भी एक कमल हुआ|
इस प्रकार में 5 कम लो से युक्त हुई| मुनिवर दुर्वासा ने मुझे देखा| उनके नेत्र क्रोध अग्नि से जल रहे थे|
वे बोले-' पापिनी! तू इसी रूप में 100 वर्षों तक पढ़ी रहे|' यह श्राप दे कर दे क्षण भर में अंतर्ध्यान हो गए| कमलिनी होने पर भी विभूति योग अध्याय के महात्मय  से मेरी वाणी लुप्त नहीं हुई है| मुझे लांघने  मात्र  अपराध से तुम पृथ्वी पर गिरे हो| पक्षीराज! यहां खड़े हुए तुम्हारे सामने ही आज मेरे श्राप की निर्मिति हो रही है, क्योंकि आज 100 वर्ष पूरे हो गए| मेरे द्वारा गाए जाते हुए उस उत्तम अध्याय को तुम भी सुन लो| उसके श्रवण मात्र से तुम भी आज ही मुक्त हो जाओगे|
    
यूं कह कर पत्नी ने स्पष्ट एवं सुंदर वाणी में दसवें अध्याय का पाठ किया और वह मुक्त हो गई| उसे सुनने के बाद उसी के दिए हुए इस उत्तम कमल को लाकर मैंने आपको अर्पण किया है|
       इतनी कथा सुनाकर उस पक्षी ने अपना शरीर त्याग दिया| यह एक अद्भुत सी घटना हुई| वही पक्षी अब दसवें अध्याय के प्रभाव से ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुआ है| जन्म से ही अभ्यास होने के कारण शैशवावस्था से ही इस के मुख से सदा गीता के 10 वें अध्याय का उच्चारण हुआ करता है| 10 वीं अध्याय के अर्थ चिंतन का यह परिणाम हुआ है कि यह सब भूतों में स्थित शंख चक्र धारी भगवान विष्णु का सदा ही दर्शन करता रहता है| इसकी स्नेह पूर्ण दृष्टि जब कभी किसी देहधारी  के शरीर पर पड़ जाती है, तब वह चाहे शराबी और भ्रम में हत्यारा ही क्यों ना हो,  मुक्त हो जाता है| तथा पूर्व जन्म में अभ्यास किए हुए 10 वें  अध्याय के महात्मय से उसको दुर्लभ तत्व ज्ञान प्राप्त है तथा इसने जीवन मुक्ति भी पाली है| पता जब यह रास्ता चलने लगता है तो मैं इसे हाथ का सहारा दिए रहता हूं| यह सब दसवें अध्याय की ही महिमा है|
पर्वती !इस प्रकार मैंने भृंगिरिटी के सामने जो पाप नाशक कथा कही थी, वहीं यहां तुमसे भी कही है,  नर हो या नारी अथवा कोई भी क्यों ना हो इस दसवें  अध्याय के श्रवण मात्र से उसे सब आश्रमों के पालन का फल प्राप्त होता है |










बोलो श्री राधे
        

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